Health Insurance के बाद भी भरना पड़ेगा बिल ?

आज के समय में स्वास्थ्य बीमा आम आदमी की ज़िंदगी में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बढ़ती स्वास्थ्य समस्याएं और महंगा अस्पताल उपचार लोगों को स्वास्थ्य बीमा लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं। अधिकांश लोग सोचते हैं कि स्वास्थ्य बीमा होने से अगर कभी बड़ी बीमारी हो जाए या अस्पताल में भर्ती होना पड़े, तो बीमा कंपनी उपचार का सारा खर्च उठा लेगी और परिवार पर कोई आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा। लेकिन जब वास्तविकता सामने आती है, तब कई लोगों को यह जानकर आश्चर्य होता है कि स्वास्थ्य बीमा होने के बावजूद उन्हें अस्पताल में बड़ी रकमें खुद से चुकानी पड़ रही हैं।

भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण, जिसे हम आमतौर पर आईआरडीएआई के नाम से जानते हैं, भारत में बीमा क्षेत्र को नियंत्रित करने वाली एक महत्वपूर्ण संस्था है। आईआरडीएआई द्वारा जारी किए गए हालिया आंकड़े एक दिलचस्प सच्चाई को उजागर करते हैं।

इन आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में स्वास्थ्य बीमा कंपनियों का दावा अनुपात लगभग 82.88 प्रतिशत रहा। इसका अर्थ यह है कि बीमा कंपनियों द्वारा एकत्र किए गए प्रीमियम से पूरा पैसा दावों के भुगतान में नहीं किया गया। यानी, दावे तो पास हुए, लेकिन कई मामलों में पूरा खर्च बीमा कंपनी द्वारा नहीं उठाया गया। यह एक महत्वपूर्ण जानकारी है जो हमें बीमा क्षेत्र की वास्तविक स्थिति को समझने में मदद करती है।

स्वास्थ्य बीमा लेने से पहले अधिकांश लोग नीति की शर्तों को ध्यान से नहीं पढ़ते हैं। बीमा एजेंट अक्सर केवल लाभों के बारे में बताता है, लेकिन नुकसान या सीमाओं के बारे में खुलकर चर्चा नहीं करता है। जब दावा करने का समय आता है, तो नीति की छोटी-छोटी शर्तें बड़ी मुश्किलें पैदा कर देती हैं। इन्हीं शर्तों के कारण मरीज़ को लगता है कि स्वास्थ्य बीमा होने के बावजूद उसे महंगा चिकित्सा बिल क्यों भरना पड़ रहा है।

स्वास्थ्य बीमा में कमरा किराया सीमा एक बहुत बड़ा कारण है। कई नीतियों में यह उल्लेख किया जाता है कि मरीज को कितनी कीमत तक का कमरा मिलेगा। अगर मरीज उस तय सीमा से ज्यादा महंगे कमरे में भर्ती हो जाता है, तो बीमा कंपनी सिर्फ कमरे का ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े दूसरे खर्चों में भी कटौती कर देती है। इसका असर पूरे बिल पर पड़ता है और मरीज को काफी पैसा अपनी जेब से देना पड़ता है।

इसके अलावा, अस्पताल में कई ऐसे खर्च होते हैं जिन्हें बीमा कंपनियाँ चिकित्सा से असंबंधित खर्च मानती हैं। इनमें दस्ताने, सिरिंज, कॉटन, फाइल शुल्क, नर्सिंग शुल्क और कई अन्य छोटे आइटम शामिल होते हैं। इलाज के दौरान ये खर्च लगातार बढ़ते रहते हैं और अंत में एक बड़ी राशि बन जाती है। बीमा कंपनी इन खर्चों को दावे में शामिल नहीं करती, जिससे मरीज़ को यह पैसा स्वयं देना पड़ता है।

पुरानी बीमारी भी एक बड़ा कारण है। अगर बीमा लेने से पहले किसी व्यक्ति को कोई बीमारी थी, तो उस बीमारी से जुड़ा इलाज तुरंत बीमा में कवर नहीं होता। ज्यादातर नीतियों में ऐसी बीमारियों के लिए दो से चार साल तक का प्रतीक्षा अवधि होती है। इस दौरान अगर मरीज को उसी बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़े, तो उसका खर्च बीमा कंपनी नहीं देती और पूरा बिल मरीज को खुद भरना पड़ता है।


कई बार नेटवर्क अस्पताल में इलाज न कराना भी परेशानी का कारण बन जाता है। अगर मरीज ऐसे अस्पताल में इलाज कराता है जो बीमा कंपनी के नेटवर्क में नहीं है, तो नगद रहित सुविधा नहीं मिलती। ऐसे मामलों में पहले मरीज को पूरा पैसा खुद देना पड़ता है और बाद में भुगतान वापसी के लिए आवेदन करना पड़ता है। इस प्रक्रिया में समय भी लगता है और कई बार पूरा पैसा वापस नहीं मिल पाता।

भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण, यानी इरडा के आंकड़े बताते हैं कि दावा अस्वीकृति या आंशिक दावा के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि बीमा किसी काम का नहीं है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि लोग बीमा को समझे बिना ही खरीद रहे हैं। सही जानकारी के बिना खरीदी गई बीमा पॉलिसी बीमारी के समय सुरक्षा प्रदान करने के बजाय तनाव बढ़ा देती है।

स्वास्थ्य बीमा खरीदते समय केवल प्रीमियम की दर कम होने पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए। यह जानना महत्वपूर्ण है कि पॉलिसी में क्या शामिल है और क्या नहीं, कमरे के किराए की सीमा क्या है, प्रतीक्षा अवधि कितनी है, और नेटवर्क अस्पताल कौन से हैं। यदि आप इन सभी बिंदुओं को पहले से समझ लें, तो बाद में आपको किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी या परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

आज के समय में स्वास्थ्य बीमा लेना बहुत जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है सही स्वास्थ्य बीमा लेना। बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण बार-बार लोगों को यही सलाह देता है कि पॉलिसी खरीदने से पहले उसकी पूरी जानकारी लें और अपनी जरूरत के हिसाब से पॉलिसी चुनें। सही पॉलिसी लेने से बीमारी के समय न सिर्फ इलाज आसान होता है, बल्कि आर्थिक तनाव भी काफी हद तक कम हो जाता है।

अंत में यही कहा जा सकता है कि Health Insurance एक सुरक्षा है, लेकिन यह सुरक्षा तभी काम करती है जब Policy को सही से समझा जाए। बिना जानकारी के लिया गया Insurance बीमारी के समय भारी Medical Bill का कारण बन सकता है, जबकि समझदारी से लिया गया Insurance परिवार को आर्थिक संकट से बचा सकता है। इसलिए Insurance को बोझ नहीं, बल्कि एक समझदारी भरा फैसला मानकर लें।
एक टिप्पणी भेजें (0)
और नया पुराने